तीन तलाक पर फिर से अध्यादेश लाने के खिलाफ याचिका पर अब विचार नहीं करेगा SC

NEW DELHI: उच्चतम न्यायालय ने एक ही बार में तीन तलाक देने की कुप्रथा को दंडनीय अपराध बनाने संबंधी अध्यादेश फिर से जारी किये जाने को चुनौती देने वाली याचिका पर सोमवार को सुनवाई करने से इंकार कर दिया। प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई, न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता और न्यायमूर्ति संजीव खन्ना की पीठ को सूचित किया गया कि मुस्लिम महिला (विवाह पर अधिकारों का संरक्षण) विधेयक लोक सभा ने पारित कर दिया था और यह राज्य सभा में लंबित था।

 

पीठ ने कहा, ‘‘हम इसमें ज्यादा कुछ नहीं कर सकते यदि राज्य सभा ने विधेयक को पारित नहीं किया।’’इस पर याचिकाकर्ताओं के वकील ने याचिका वापस लेने का अनुरोध किया तो पीठ ने कहा, ‘‘याचिकाओं को खारिज किया जाता है क्योंकि इसे वापस ले लिया गया है।’’ केन्द्रीय मंत्रिपरिषद की मंजूरी के चंद घंटों के भीतर ही 19 सितंबर, 2018 को पहली बार मुस्लिम महिला (विवाह पर अधिकारों का संरक्षण) अध्यादेश अधिसूचित किया गया था।

 

एक ही बार में तीन तलाक, जिसे ‘तलाक-ए-बिद्दत’ भी कहते हैं, तलाक देने की पुरानी प्रथा है जिसमें मुस्लिम व्यक्ति एक ही बार में तीन बार ‘तलाक’ कह कर पत्नी को तलाक दे सकता है। एक बार में तीन तलाक देने की प्रथा को दंडनीय अपराध बनाने के लिये सरकार ने एक साल में तीसरी बार 21 फरवरी को अध्यादेश जारी किया है। इस अध्यादेश के अंतर्गत एक बार में तीन तलाक को गैरकानूनी घोषित किया गया है और इस अपराध के लिये पति को तीन साल तक की जेल की सजा का प्रावधान किया गया है।

 

याचिकाकर्ताओं के वकील ने इस पर अपनी याचिका वापस लेने का अनुरोध किया जिसे न्यायालय ने स्वीकार कर लिया। शीर्ष अदालत की संविधान पीठ पहले ही बहुमत के निर्णय में एक बार में तीन तलाक देने की प्रथा को असंवैाधानिक और इस्लामी कानून शरिया के खिलाफ करार दे चुकी है।

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