अपनी इस समस्या से अनभिज्ञ हैं भारत की 71 प्रतिशत महिलाएं, शर्म है वजह

NEW DELHI: हालिया शोध बताता है कि भारत में लगभग 71 प्रतिशत लड़कियों को मासिक धर्म के बारे में कुछ भी नहीं पता है। इसके बारे में जागरूकता की कमी एक लड़की को, कभी-कभी 10 साल की उम्र में, मानसिक आघात की समस्या दे सकती है। सामाजिक कलंक और शर्म की भावना के कारण मासिक धर्म से कई बार महिलाओं को भारी समस्या झेलनी पड़ती है।

 

ग्रामीण भारत में लगभग 80 प्रतिशत लड़कियां माह में तीन से चार दिन स्कूल मिस कर देती हैं, और यह अक्सर मासिक धर्म की शुरुआत के समय होता है। यह सैनिटरी पैड के उपयोग के बारे में जागरूकता की कमी से होता है। पुराने कपड़े में रिसाव और निशान पड़ने का डर होता है, जिसके कारण लड़कियों को संक्रमण हो सकता है और असुविधा भी। सैनिटरी नैपकिन की कमी के अनेक कारण हैं, अधिक कीमत उनमें से एक है।

 

इस बारे में बात करते हुए पद्मश्री डॉ. केके अग्रवाल और वरिष्ठ स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. अनीता कांत ने कहा, मासिक धर्म के बारे में मिथक और इससे जुड़े कलंक भारत में लड़कियों और महिलाओं के कई मुद्दों में से एक हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में, महिलाओं और लड़कियों को अभी भी मासिक धर्म से संबंधित दर्द या अन्य मुद्दों पर खुलकर चर्चा करने की अनुमति नहीं है। वे स्कूल, कॉलेज और काम छोड़ देती हैं। उनमें मासिक धर्म स्वच्छता को जल्द से जल्द शामिल किया जाना चाहिए। हाइजीनिक तरीकों की कमी से संक्रमण हो सकता है और यहां तक कि सर्वाइकल कैंसर भी हो सकता है।

 

इसके अलावा, पीरियड्स को सामान्य और किसी भी अन्य शारीरिक प्रक्रिया की तरह सामान्य बनाना अत्यावश्यक है। अध्ययनों से संकेत मिलता है कि लगभग 70 प्रतिशत तक माताएं मासिक धर्म को गंदा और प्रदूषणकारी मानती हैं। वे इस विषय के बारे में अपनी बेटियों से बात नहीं करती हैं और न ही उनकी चिंताओं का समाधान करती हैं। आईएमए (नई दिल्ली ब्रांच) की सेक्रेटरी डॉ. मेजर प्राची गर्ग ने आगे कहा, मासिक धर्म स्वच्छता आदि का विषय सिर्फ घर की महिला सदस्यों तक ही सीमित नहीं होना चाहिए। परिवार में पुरुषों के बीच भी जागरूकता पैदा करने की जरूरत है। ग्रामीण क्षेत्रों में, इस विषय पर लड़कियों और लड़कों को समान रूप से शिक्षित करने के लिए स्कूलों में सक्षम वातावरण बनाना भी अनिवार्य है।

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