गलियों में बेचते थे साड़ी, अब बने करोड़पति

NEW DELHI. मेहनत को किस्मत का साथ मिल जाए तो सफल होने से किसी को रोका नहीं जा सकता है। ऐसी ही कहानी है बिरेन कुमार बिसाक की। एक समय था जब बिरेन गलियों में फेरी लगा कर साड़ी बेचा करते थे और उनकी रोजाना की कमाई महज 2.50 रुपये थी।

बिरेन का जन्म 16 मई 1951 को हुआ। वह कोलकाता के नादिया जिले के रहने वाले हैं और पेशे से साड़ी बुनने का का काम करते हैं। शुरुआती दिनों में वह कंधे पर साड़ियों का गट्ठर लादकर कोलकाता की गली में घूम-घूम कर साड़ी बेचा करते थे। आज वह करोड़ों रुपये के मालिक हैं, लेकिन एक समय था जब वह एक बुनकर के यहां 2.50 रुपये दिहाड़ी पर साड़ी बुनने का काम किया करते थे।

बिरेन की मेहनत ने रंग दिखाया और कड़े संघर्ष के बाद उन्होंने अपनी साड़ी कंपनी ‘बसाक एंड कंपनी’ स्थापित की। आज इसका टर्नओवर 50 करोड़ रुपये का है। उन्होंने साड़ी पर रामायण के सात खंड लिखे थे, जिसके लिए ब्रिटिश यूनिवर्सिटी ने उन्हें डॉक्टरेट की मानद उपाधि से सम्मानित किया था। उन्होंने 1996 में इस साड़ी को तैयार किया था। जो 6 गज की है। धागों में रामायण उकेरने की तैयारी में उन्हें एक साल लग गया था जबकि उसे बुनने में करीब 2 साल लगे थे।

बसाक की छह गज की साड़ी पर यह जादुई कलाकृति उन्हें इससे पहले भी राष्ट्रीय पुरस्कार, नेशनल मेरिट सर्टिफिकेट अवार्ड, संत कबीर अवार्ड दिला चुकी है। उनका नाम लिम्का बुक ऑफ रिकार्ड, इंडियन बुक ऑफ रिकार्ड्स और वर्ल्ड यूनीक रिकार्ड्स में भी दर्ज है।

अपना कारोबार शुरू करना भी कम मुश्किल नहीं थी। बिजनेस के लिए पैसे नहीं थे, तो उन्होंने अपना घर गिरवी रखकर 10 हजार रुपये का लोन लिया। बुनकर के यहां से साड़ी लेकर उन्हें बेचने के लिए कोलकाता के फुलिया जाते थे। एक बार में वह अपने कंधों पर 80 से 90 किलो का भार लिए डोर-टू-डोर साड़िया बेचा करते थे।

उन्होंने 1987 में पहली साड़ी की दुकान खोली। शुरुआत में उनके पास सिर्फ 8 लोग काम करते थे। आज वह हर महीने हाथ से बनी 16 हजार से ज्यादा साड़ियां देश भर में बेचते हैं। सिर्फ इतना ही नहीं अब उनके यहां कर्मचारियों की संख्या बढ़कर 24 हो गई और वह करीब 5 हजार बुनकरों के साथ काम कर रहे हैं।

मुंबई की एक कंपनी ने 2004 में बसाक को रामायण के सात खंड लिखी हुई साड़ी के बदले में आठ लाख रुपये देने की पेशकश की थी, जिसे उन्होंने ठुकरा दिया था। साड़ी पर रामायण उकेरने के बाद अब बसाक की योजना रबींद्रनाथ ठाकुर के जीवन को उकेरने की है और इसके लिए वह तैयारी कर रहे हैं।

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