बिगड़ेंगे सैटेलाइट्स, होंगी विनाशकारी भूगर्भीय हलचलें

(नीता बुधौलिया)
NEW DELHI. 21वीं सदी का सबसे लंबा खग्रास चंद्रग्रहण 27-28 जुलाई को होने वाला है। यह एक महत्वपूर्ण खगोलीय घटना है। इसकी महत्ता को ऐसे भी समझा जा सकता है कि इसके आगे-पीछे 13 जुलाई और 11 अगस्त 2018 को दो खंडग्रास सूर्यग्रहण पड़ेंगे। लगातार तीन ग्रहणों में खग्रास चंद्रग्रहण का ज्योतिषीय और खगोलीय प्रभाव गहरा होना अवश्यंभावी है। विशेषतः कर्क रेखा क्षेत्र में विनाशकारी भूकंप, सुनामी, चक्रवात, ज्वालामुखी विस्फोट एवं आगजनी की घटनाएं हो सकती हैं। इसके अतिरिक्त पृथ्वी की कक्षा में विभिन्न देशों के हजारों सैटेलाइट्स मौजूद हैं। इनमें से कुछ प्रभावित होकर बिगड़ सकते हैं या नियंत्रण खो सकते हैं। ऐसे में विश्वभर में सैटेलाइट्स सेवाएं गड़बड़ा सकती हैं। चाहे वे संचार संबंधी हों या अन्य सुरक्षा व सुविधा संबंधी। वायुयान भी प्रभावित हो सकते हैं। पूर्व माहों में ऐसी घटनाएं हो भी चुकी हैं। नेपाल में हुए विमान हादसे के अलावा इस वर्ष लगभग आधा दर्जन विमान हादसे हो चुके हैं। एक वर्ष के अंदर इसरो के दो सैटेलाइट लांच फेल हो चुके हैं। चीन का स्पेस स्टेशन गिरा है। रूस का उपग्रह खोया है। वर्ष 2017 और 2018 में इस तरह की घटनाएं होने की भविष्यवाणी ज्योतिषाचार्य पंडित अरुणेश कुमार शर्मा एक वर्ष पूर्व से करते आ रहे हैं। वर्ष 2017 में ग्लेशियर टूटने से लेकर भूकंप की कई घटनाएं हुईं थी। वैज्ञानिकों ने भी माना है कि पृथ्वी की गति में कमी आई है जो भूकंपीय घटनाओं को बढ़ा सकती है।
ग्रहण महज दिखाई न देने की घटना नहीं
ज्योतिषाचार्य पंडित अरुणेश कुमार शर्मा ने बताया कि ग्रहण महज सूर्य प्रकाश से निर्मित छाया में सूर्य और चंद्रमा के नजर न आने की घटना मात्र नहीं है। सूर्य के साथ संपूर्ण सौरमंडल 70 हजार किलोमीटर की गति से आगे बढ़ रहा है। ग्रहों-उपग्रहों को इससे तालमेल बनाए रखना होता है। ज्योतिष में पृथ्वी के लिए राहु-केतु वे छायाग्रह हैं जिनके जुड़ाव में सूर्य और चंद्रग्रहण बनते हैं। ये सौरमंडल के वे नोडल पाइंट हैं जहां पृथ्वी और चंद्रमा सूर्य की एक सीध में आकर आॅटो-करेक्शन लेते हैं। इसमें चंद्र व पृथ्वी की कक्षाएं सुव्यवस्थित होती है। इससे अंतरिक्षीय गुरुत्वीय तरंग प्रभावित होने और ग्रह-उपग्रहादि के स्पेस-शिफ्ट की आशंका बढ़ जाती है। इनमंे अन्य सौरमंडलीय ग्रहों का भी योगायोग प्रभाव भी असर डालता है। इससे भूकंप, चक्रवात, ज्वालामुखी व सुनामी की आशंका के अलावा उपग्रहों और विमानों के गड़बड़ाने की आशंका भी बढ़ जाती है। ज्योतिषानुसार यह प्रभाव हर जीव और जड़ पर पड़ता है। इसी कारण ग्रहण में शारीरिक-मानसिक परिश्रम से बचने सलाह दी जाती है। अग्निकर्म व मशीनरी के प्रयोग को त्याज्य माना जाता है। सनातनी परम्परा में देवदर्शन और यज्ञादि कर्म निषेध रखे जाते हैं। सहज मुद्रा में भजन-कीर्तन और जप के माध्यम से ईश्वर को याद किया जाता है।
6 घंटा 14 मिनट तक रहेगा आगामी चंद्रग्रहण
27 जुलाई 2018 का चंद्रग्रहण 21वीं सदी का सबसे लंबा चंद्रग्रहण है। इसकी कुल अवधि 6 घंटा 14 मिनट रहेगी। इसमें पूर्णचंद्र ग्रहण की स्थिति 103 मिनट तक रहेगी। भारत में यह लगभग रात्रि 11 बजकर 55 मिनट से स्पर्श कर लगभग 3 बजकर 54 पर पूर्ण होगा। इसमें पृथ्वी के मध्यक्षेत्र की छाया चंद्रमा पर पड़ेगी। इसके आगे-पीछे की अमावस्याओं पर खंडग्रास सूर्य ग्रहण भी होंगे। इनका गहरा प्रभाव पृथ्वी पर होना सुनिश्चित है।
26 जुलाई 1953 को बना था सबसे लंबा चंद्रग्रहण
आगामी 26 जुलाई 1953 को बीसवीं सदी का सबसे लंबा चंद्रग्रहण पड़ा था। यह पूर्णावस्था में लगभग 101 मिनट रहा। इसका कुल ग्रहण समय 5 घंटा 27 मिनट था। इसी ग्रहण के बाद अगस्त के मध्य में ग्रीस के केफलोनिया और जाकिनथोस द्वीप क्षेत्र में लगभग 113 भूकंप आए। इनमें सबसे विनाशकारी 12 अगस्त को लोनियन आइसलैंड में आया 7.2 मैग्निट्यूड स्केल का भूकंप आया था। इसमें लगभग 800 लोगों की मौत की सूचना थी। भूकंप में तबाह हुईं इमारतों के चिह्न वहां अभी मौजूद हैं।
कर्क रेखा क्षेत्र पर आते हैं ये देश
भारत, बांग्लादेश, म्यांमार, चीन, ताइवान, संयुक्त राज्य अमेरिका का हवाई द्वीप, मैक्सिको, बहामास, मुरितानिया, माली, अल्जीरिया, नाइजर, लीबिया, चाड, मिस्त्र, सउदी अरब, यूएई और ओमान देश प्रमुखता से आते हैं।
हिन्दू धर्म-दर्शन के प्रतीक कुंभ-मेलों का है ग्रहणों से महत्वपूर्ण संबंध
भारतीय धर्म दर्शन और आस्था के सर्वाेच्च आयोजन कुंभ मेलों का संबंध भी ग्रहण और इनके प्रभाव से है। हरिद्वार और प्रयाग के कुंभ मेले जनवरी से मार्च माह के बीच मनाए जाते हैं। जबकि नासिक मेला अगस्त-सितंबर में और उज्जैन का सिंहस्थ कुंभ मेला अप्रैल-मई में मनाया जाता है। भारत के संदर्भ में खग्रास सूर्य और चंद्रग्रहण जनवरी से मार्च व जुलाई से सितंबर माह के बीच ही आते हैं। इसी दौरान भूकंप आदि घटनाओं की आशंका बढ़ी हुई रहती है। ऐसे मेें नदियों के खुले किनारों से सुरक्षित कोई अन्य जगह नहीं हो सकती है। जबकि उज्जैन महाकालेश्वर मंदिर से होकर गुजरती कर्क रेखा को भारत के संदर्भ में पृथ्वी का केंद्र समझा जाता है इसलिए सिंहस्थ कुंभ का आयोजन अप्रैल-मई माह में होता है। 2019 में प्रयाग में होने वाले कुंभ मेले के दौरान 20-21 जनवरी को भी खग्रास चंद्रग्रहण होना है। इस दौरान भी भूगर्भीय हलचलों के बढ़ने की आशंका है।
आगामी महत्वपूर्ण खगोलीय घटनाएं और उनके प्रभाव
1- 26 जून से पृथ्वी तत्व बली मंगल ग्रह उच्च राशि मकर में वक्री होंगे। मकर राशि भी पृथ्वी तत्व राशि है। पृथ्वी पर भौगोलिक हलचलों के बढ़ने के साथ गृह निर्माण सामग्री, भूमि और विभिन्न धातुओं के बाजार में आएगी सक्रियता।
2- 10 जुलाई को गुरु ग्रह वकी्र से मार्गी होंगे। धर्म अध्यात्म मशीनरी और शिक्षा संबंधी गतिविधियां बढ़ेंगी। जिम्मेदारों में बढ़ेगा जिम्मेदारी का भाव और अनुशासन।
3 13 जुलाई को खंडग्रास सूर्य ग्रहण होगा। यह भारत में मान्य नहीं है लेकिन पृथ्वी पर विभिन्न हलचलों को बढ़ाएगा। जलीय क्षेत्रों में बसे लोग सावधानी बरतें। हो सके तो अगले खंडग्रास सूर्यग्रहण तक समुद्री सीमा से दूरी बढ़ाएं।
4- 19 जुलाई सौरमंडल की यह महत्वपूर्ण घटना है। सूर्य के एक ओर बुध, शुक्र, पृथ्वी, मंगल, गुरु और शनि आदि सारे ग्रह एक ओर उपस्थिति मौजूद होंगे। यह स्थिति सौरमंडल में असंतुलन बढ़ाएगा। चूंकि सौरमंडल का जीवनयुक्त एक मात्र ग्रह पृथ्वी है, इसके अधिक प्रभावित होने की आशंका है।
5- 26 जुलाई को ज्योतिष में चंद्रमा का पुत्र माना जाने वाला बुध ग्रह वक्री होगा। यह परिवर्तन सदी के सबसे लंबे चंद्रग्रहण के को और प्रभावी बनाएगा।
6- 27-28 जुलाई 2018 को सदी का सबसे लंबा खग्रास चंद्रग्रहण होगा। यह विभिन्न विनाशकारी भौगोलिक घटनाआंे का कारक हो सकता है।
7- 11 अगस्त को खंडग्रास सूर्य ग्रहण होगा। भारत में अमान्य रहेगा। यह भी विश्व में विभिन्न भौगोलिक और जलीय आपदाओं को बढ़ावा देने वाला हो सकता है।
8- 27 अगस्त को मंगल मकर राशि में वक्री से मार्गी होंगे। यहां से भौगोलिक घटनाओं की आशंकाओं में कमी आएगी।
9- 6 सितंबर 2018 को शनि ग्रह मार्गी होंगे। वे 18 अप्रैल 18 से अग्नितत्व राशि धनु में वक्री गति से संचार कर रहे हैं। 142 दिन की यह वक्र गति पृथ्वी पर आंधी, तूफान, चक्रवात और आगजनी को बढ़ावा देने वाली है। इसे 26 जून से मंगल की वक्रगति और भी आकस्मिक व प्रभावकारी बनाने वाली है। शनि-मंगल की यह गति मानसून में कहीं अल्पवर्षा तो कहीं अतिवर्षा के लिए भी जिम्मेदार रहने वाली है।

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