राहुल गांधी को अगले महीने कांग्रेस की कमान

NEW DELHI. काफी लंबे समय से कांग्रेस कार्यकर्ताओं की यह मांग कि उपाध्यक्ष राहुल गांधी को पार्टी की कमान सौंपी जाए, उनका यह इंतज़ार अब खत्म हो गया है। सोमवार को सोनिया गांधी के आधिकारिक आवास दिल्ली के 10 जनपथ पर बुलाई गई कांग्रेस वर्किंग कमेटी (सीडब्ल्यूसी) की बैठक में अध्यक्ष पद के लिए चुनाव के कार्यक्रम की घोषणा कर दी गई। कार्यक्रम के मुताबिक, चुनाव की अधिसूचना 1 दिसंबर को जारी होगी और नामांकन पत्र भरने की अंतिम तारीख 4 दिसंबर जबकि नामांकन पत्र वापस लेने की अंतिम तिथि 11 दिसंबर है। यदि एक से ज़्यादा वैध नामांकन दाखिल होते हैं और चुनाव की नौबत आती है, तो मतदान 16 दिसंबर को होगा जबकि मतगणना 19 दिसंबर को होगी। हालांकि, ऐसा माना जा रहा है कि 47 वर्षीय राहुल गांधी का निर्विवाद अध्यक्ष पद के लिए चुना जाना तय है।

लेकिन, सबसे बड़ी बात ये है कि राहुल गांधी को प्रेसिडेंट बनाने में आखिर इतनी देरी क्यों हुई और राहुल गांधी को कांग्रेस की कमान देने के बाद उनके सामने वो कौन-कौन सी चुनौतियां सामने होंगी जिससे राहुल को दो-चार होना पड़ेगा? आइये जानने का प्रयास करते हैं।

पार्टी की तरफ से कई बार राहुल गांधी को राष्ट्रीय अध्यक्ष पद बनाने की असफल कोशिशों के बाद आखिरकार राहुल गांधी पार्टी की कमान संभालने जा रहे हैं। पार्टी में शीर्ष पद की अहम जिम्मेदारी के बाद राहुल गांधी के पास अपने आपको साबित करने का बेहतर मौका होगा। आइये बताते हैं वो कौन सी बातें है जो राहुल गांधी की नई भूमिका में उनके लिए मददगार साबित होंगी। हाल के दिनों में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व केन्द्रीय मंत्री मणिशंकर अय्यर ने जो कहा उससे यह जाहिर होता है कि कांग्रेस बदल रही है। पार्टी अध्यक्ष के चुनाव पर बोलते हुए अय्यर ने कहा था- ‘मैं ऐसा मानता हूं कि कांग्रेस में सिर्फ दो लोग ही अध्यक्ष बन सकते हैं- मां या बेटा।’ मणिशंकर अय्यर के इस कठोर बयान के बाद ये बात बिल्कुल साफ है कि गांधी परिवार के पुराने वफादारों को आनेवाले दिनों में कुछ खास अहमियत नहीं दी जाएगी। राहुल गांधी अब कांग्रेस के पुराने वफादारों की जगह नए नेताओं पर विश्वास कर रहे हैं। सचिन पायलट और ज्योतिरादित्य सिधिंया का पार्टी में कद बढ़ना इसी बात का संकेत है कि सोनिया के विश्वासपात्र रहे लोगों को बहुत ज्यादा तवज्जो वे नहीं देने जा रहे हैं।

 

कांग्रेस के पुराने नेता पारंपरिक मतदाताओं के अंकगणित से ऊपर की नहीं सोच पा रहे हैं जबकि भारत दिनों दिन काफी परिवर्तन कर रहा है। ऐसे में नए सलाहकारों के समूह से राहुल गांधी को नई पीढ़ी से जुड़ने में मदद मिलेगी और एक नयी रिवायत शुरु होगी जिसकी उन्हें अभी सख्त जरुरत है। जाहिर तौर पर कांग्रेस के पुराने वफादार जिनमें कई जमीन से जुड़े नेता हैं उनकी जगह राहुल के नए सलाहकारों के आने से राहुल की चुनौतियां और बढ़ जाएगी क्योंकि उनमें से कई लोग ऐसे होंगे जिनका कोई जनाधार नहीं होगा। लेकिन, केवल नई सोच के साथ नए नेताओं की बदौलत कांग्रेस को बदला जा सकता है।

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